~ कमबख्त हम थे के ख़ाक छानते रहे ~

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ज़िंदगी अक्सर फूल पकड़ाती रही,

कमबख्त हम थे के ख़ाक छानते रहे ।

वो करती रही हमारा इंतजार, उस पुराने मोड़ पर,

हम थे के उसकी बेवफ़ाई के गीत गाते रहे ।

खुदा बैठा रहा भूखे बच्चे की शक्ल में दिन भर,

लोग मंदिरों में दूध चढ़ाते रहे।

सोचा था ज़माना कुछ तो समझेगा अल्फ़ाज़ मेरे,

पर फ़िज़ूल ही हम अंधों को आईना दिखाते रहे ।

ज़िंदगी अक्सर फूल पकड़ाती रही,

कमबख्त हम थे के ख़ाक छानते रहे ।

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